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शहबाज की शराफत के आसरे नवाज

पाकिस्तानी राजनीति में दिलचस्पी रखने वाले काफी दिनों से इसकी प्रतीक्षा कर रहे थे और अंत में वह समय आ ही गया, जब प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को इस्तीफा देना पड़ा। यह मानना कि ऐसा सिर्फ पाकिस्तानी सुप्रीम कोर्ट की अन्यायपूर्ण और असाधारण सक्रियता के कारण हुआ है, केवल अद्र्ध-सत्य है। पूरा सच जानने के लिए हमें थोड़ा पीछे जाना होगा। पांच साल पहले भी पाकिस्तानी प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी को सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर ...

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मायावती के सामने नई मुश्किलें

बसपा सुप्रीमो मायावती अपने राजनीतिक जीवन के सबसे कठिन दौर से गुजर रही हैं। पिछले 20 वर्षों में दलित एकजुटता से शुरू हुई उनकी राजनीति आगे बढ़ते हुए बहुजन गोलबंदी से होते हुए सर्वजन तक सफल ढंग से फैलती गई, किंतु अब इसमें ठहराव आ गया है। ‘सर्वजन’ को जोडऩे के उनके प्रयास अब ‘दलित आधारमत’ बचाने की जद्दोजहद तक सिमट गए हैं। माना जा रहा है कि पिछले चुनावों में दलितों के एक वर्ग ने उनसे अलग होकर भाजपा को मत दिया। इस ...

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कृषि मंत्री जी फसल बीमा को लेकर कोई खेल तो नहीं हो रहा है

राज्यसभा में राधा मोहन सिंह ने कहा कि 2015-16 में कुल प्रीमियम 3,706 करोड़ दिया गया और 4,710 करोड़ के दावे निपटाए गए। अब दावों का खेल देखिये। 16 अगस्त 2016 के इंडियन एक्सप्रेस में पीटीआई के हवाले से खबर छपी है कि कृषि मंत्रालय ने प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत बीमा दावों के निपटान के लिए केंद्र से 11,000 करोड़ की मांग की है। इस रिपोर्ट में एक अज्ञात कृषि अधिकारी ने पीटीआई को बताया है कि 2015-16 के लिए 5 ...

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कतई नई नहीं है फेक न्यूज की बात… हां, नाम जरूर नया है…

कई साल बाद झूठी ख़बरों की समस्या फिर चर्चा में आई है। हां, झूठी खबरों का नामकरण जरूर नया है। अपने देश में इसे इस समय अंग्रेजी में फेक न्यूज नाम दिया गया है। कोई 10 साल पहले इसी तरह की खबरों को पेड न्यूज कहकर चिंता जताई गई थी। उसके भी 10-20 साल पहले हम ऐसी ही दुर्लभ खबरों को प्रोपेगंडिस्ट मीडिया के नाम से जानते थे। यानी झूठी खबरों का चलन कोई नया नहीं है। हां, इसमें कुछ नया है तो बस इतना कि दुनियाभर की सरकारे ...

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बंगाल: आहत धार्मिक भावना के ठेकेदारों से नमस्ते कर लीजिए

प्रदायिक सोच रखने वालों के लिए बंगाल नई खुराक है। वे कभी बराबरी तो कभी चुप्पी के नाम पर इस खुराक को फांक रहे हैं। उनके लिए बंगाल की हिंसा बहुसंख्यक सांप्रदायिकता पर प्रहार करने वालों का मज़ाक उड़ाने का मौका है। उन्हें कब और किसने यह बात कह दी है कि जो बहुसंख्यक सांप्रदायिकता का विरोधी है वो अल्पसंख्यक सांप्रदायिकता का गुप्त समर्थक है। ये वही लोग हैं जो खुद बहुसंख्यक सांप्रदायिकता पर चुप रहे हैं और अल्पसंख्य ...

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