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संत दामाजी की दया पर एक बादशाह भरी सभा में हुआ शर्मिंदा

तेरहवीं शताब्दी में भारत में भयंकर अकाल पड़ा। उन दिनों गोलकुंडा-बेदरशाही के अंतर्गत मंगलबेड़ा प्रांत का कारोबार संत दामाजी के जिम्मे था। अकाल में भूखे लोगों की चीत्कार उनसे सुनी न गई और उन्होंने बादशाह की अनुमति के बगैर अन्न भंडार प्रजा के लिए खोल दिया। संत दामाजी के सहायक सूबेदार से यह न देखा गया। उसने मामला बादशाह को पत्र लिखकर बताया तो बादशाह ने सिपाहियों को दामाजी को पकड़ लाने की आज्ञा दी। तभी हाथ में थ ...

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राजनीति का मतलब

राजनीति का मतलब- झूठ है, छल है, दगा है। राजनीति में कौन, किसका सगा है? राजनीति का मतलब- थप्पी है, पेटी है, खोखा है। राजनीति में कदम-कदम पे धोखा है।। राजनीति का मतलब- जहां ईमानदार खून के आंसू रोता है। राजनीति में बेईमान ही धांसू होता है।। राजनीति का मतलब- चिलम भरने की कलाकारी है। राजनीति में चप्पे-चप्पे पे मक्कारी है।। राजनीति का मतलब- कोई नहीं सोचता, हमें करना सेवा है। राजनीति में सबकी चाहत, मेवा-ही-मेवा है ...

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पत्नी से झगडक़र बनने चले थे संत, हुई ऐसी घटना लौट आए घर

महाराष्ट्र के रोजन नगर में एक ब्राह्मण हमेशा अपनी पत्नी से लड़ता रहता था। अक्सर वह पत्नी को धमकी देता, मेरी बात नहीं मानेगी, तो संत संतोबा पवार का शिष्य बन जाउंगा। एक दिन ब्राह्मण की अनुपस्थिति में संत संतोबा भिक्षा मांगने उसके घर आए। ब्राह्मण की पत्नी ने संत को बताया कि पति आपका शिष्य बनने की धमकी देता है। संत जी मुस्कुराकर बोले, बेटी, अब उसे कह देना कि बन जाओ शिष्य संतोबा जी के। मैं ऐसा मंत्र फूंक दूंगा क ...

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अम्मा लो बात करो फोन से…

अम्मा लो बात करो फोन से टीचरजी होल्ड किए, बात उन्हें करना है। लगता है मेरा ही, कोई सा उलाहना है, न मालूम थोपेंगी, काम मुझे कौन से। टीचर ने बोला है, मम्मी से कहलाना। मैं कैसी शिक्षक हूं, उनका मत भिजवाना। वेरी गुड लिखना मां, अच्छे से पेन से। सच में मां टीचरजी, बहुत नेक व सच्ची हैं, बाहर से कर्कश हैं, भीतर से अच्छी हैं उनके कारण ही मैं, पढ़ पाती चैन से। ...

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कौन ज्यादा मनहूस आप या वो?

एक नगर में एक व्यक्ति इसीलिए मशहूर हो गया कि उसका चेहरा मनहूस था। ऐसा उस नगर में रहने वाले लोग कहते थे। यह बात जब राजा के पास पहुंची तो इस धारणा पर उन्हें विश्वास नहीं हुआ। राजा ने उस व्यक्ति को अपने महल में रख लिया और सुबह उठते ही उस व्यक्ति का मुंह देखा। इस तरह राजा अपने दैनिक कार्यों में व्यस्त हो गए। व्यस्तता इतनी अधिक थी कि उस दिन राजा भोजन भी न कर सके। शाम होते ही उन्हें पूरा यकीन हो गया कि यह व्यक्ति ...

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